Faqsideos – Episode 5
प्रत्येक मनुष्य के शरीर में जन्म से ही एक सूक्ष्म तंत्र होता है। जिसमें तीन नाड़ियां,सात चक्र और परमात्मा की दी हुई शक्ति विद्यमान है। परमात्मा की यही शक्ति जो कि कुंडलिनी शक्ति के नाम से जानी जाती है,हमारी रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग में सुप्त अवस्था में रहती है। श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा सहजयोग के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति की जागृति सहज में ही हो जाती है,और मनुष्य योग अवस्था को प्राप्त करता है।
Friday, October 9, 2020
Faqsideos – Episode 4 : How is Sahaja Yoga meditation different from other types of meditation?
Faqsideos – Episode 4 : How is Sahaja Yoga meditation different from other types of meditation?
How is Sahaja Yoga meditation different from other types of meditation?
Sahaja Yoga is not any physical exercise or breath control method. It is purely meditation – dhyan (as called in Hindi. It was started by the Founder, Shri Mataji Nirmala Devi, in the year 1970 on the 5th of May – known as World Sahasrara Day - since the Sahasrara Chakra or the 7th Chakra/ Crown Chakra of our universe was opened on this day by her. She had been very spiritually inclined since early childhood and she purposely led a very ordinary life of a householder playing the role of a dutiful wife, loving mother to two daughters and grandchildren. After taking care of her worldly duties, she was blessed with the divine grace to open the 7th chakra at Universal level because of which ‘self-realization’ or ‘Kundalini Awakening’ could be given en masse. It is a breakthrough in the spiritual awakening or spiritual evolution. Earlier, self realization or kundalini awakening could happen to rare few people because humanity was yet to be ready to receive this tremendous divine power. As it is said by Her Holiness – Truth can be borne only by those who have the capacity to bear it. Truth is God. So with Sahaja Yoga meditation, you connect directly with your creator without any intervention of a thirst party. You become your own master….leading very ordinary lives.
FAQs on Sahaja Yoga - Why should people already worshiping God be interested in Sahaja? Episode 3
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Episode 3
FAQs - How can Sahaja Yoga be introduced to atheists? Episode 2
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Saturday, October 3, 2020
Achieve the Deep Meditation Status and spread the divine light among seekers!
"...जो आनंद आप अपनी ध्यान की स्थिति में प्राप्त करते है , उसको बांटा जाना चाहिए , उसको दिया जाना चाहिए , दिखाया जाना चाहिए। यह आपके अस्तित्व में ऐसे बहना चाहिए जैसे की प्रकाश निकलता है हर रौशन दीप से। हमें कोई शपथ नहीं लेनी पड़ती यह कहने के लिए की यह एक प्रज्वलित दीप है , इसी प्रकार , एक संत को प्रमाणित नहीं किया जाना चाहिए की वो संत है। क्योंकि जो गहराई आप अपने अंदर हासिल करते है , वो सब जगह फ़ैल जाती है , यह ऐसी ही क्रिया और प्रतिक्रिया है।
जितनी अधिक गहराई आप हासिल करेंगे , प्रक्षेपण उतना ही अधिक होगा। एक सरल व्यक्ति , अत्यंत साधारण व्यक्ति , अत्यंत साधारण व्यक्ति , अनपढ़ व्यक्ति , ऐसा हो सकता है। आपको ध्यान में बहुत ज्यादा समय नहीं व्यतीत करना है , लेकिन जो भी समय आप व्यतीत करें , आपको जो भी प्राप्त होता है , वो बाहर दिखना चाहिए , कैसे आप प्रक्षेपित करते है , और कैसे आप दूसरों को देते है। .."
( परम पूज्य श्री माताजी , देवी पूजा , सिडनी , ऑस्ट्रेलिया - १९८३ )
Nabhi Chakra - Article in Hindi - Shri Mataji's Quotes
तृतीय चक्र नाभि चक्र कहलाता है। नाभि के पीछे इसकी दस पंखुरियाँ हैं। यह चक्र किसी भी चीज़ को अपने अन्दर बनाये रखने की शक्ति हमें देता है। शारीरिक स्तर पर यह सूर्य चक्र में सहायक है।
नाभि चक्र पर श्री लक्ष्मी-नारायण का स्थान है। श्री लक्ष्मी-नारायण जी का स्थान जो है हमें धर्म के प्रति रूचि देता है। उसी के कारण हम धर्मपरायण होते हैं, उसीसे हम धर्म धारण करते हैं। कार्बन में जो चार संयोजकतायें हैं वे भी इसी धर्म
धारणा की वजह से हैं।
प.पू.श्री माताजी, मुम्बई, २२.३.१९७९
आपका नाभि चक्र यह सुझाता है कि आप अभी तक भी भौतिकता में फँसे हुए हैं। छोटी-छोटी चीज़ों में भी हम भौतिकवादी होते हैं। यह दुर्गुण सूक्ष्मातिसूक्ष्म होता चला जाता है। अतिव्यक्तिवादी या यह सबकी व्यक्तिगत चीज़ है। नाभि चक्र अत्यन्त व्यक्तिवादी है,
प.पू.श्री माताजी, १८.१.१९८३
अगर आप चालबाज़ी करते हैं या करने की कोशिश करते हैं तो आपका नाभि चक्र क्षतिग्रस्त होता है और आप अपनी चेतना खो बैठते हैं। पैसे के मामले में आपके सहजयोग के प्रति कैसे आचरण हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण बात है...क्योंकि इससे नाभि खराब हो जाती है।
प.पू.श्री माताजी, ४.२.१९८३
बाईं नाभि को यदि उत्तेजित कर दिया जाये जैसे हर समय दौड़ते रहने से, उछल-कूद से, उत्तेजना से, तो उत्तेजित बाईं नाभि के कारण रक्त कैन्सर हो सकता है। जो औरतें पति से दुर्व्यवहार करती हैं, उसकी उपेक्षा करती हैं, उन्हें भयानक आत्माघात (Siriosis), मस्तिष्क घात, पक्षाघात, शरीर का पूर्ण डिहाइड्रेशन हो सकता है। बाईं नाभि बहुत महत्वपूर्ण है।
प.पू.श्री माताजी, सेंट जार्ज, १४.८.१९८८
अन्तर्जात गुण
१. संतोष - विकास प्रक्रिया में आप यदि उस अवस्था तक पहुँच जाते हैं जहाँ आप नाभि चक्र के ऊपर उठ जाते हैं, यानी नाभि चक्र को पार लेते हैं तो पैसा अधिक महत्वपूर्ण नहीं रह जाता..... संतोष प्राप्त हो जाता है।
प.पू.श्री माताजी, १८.८.२०००
...... संतोष मतलब जो मिला खूब मिला, अब और कुछ नहीं चाहिये। .....एक ऐसा सहजयोगी जिसके पास कुछ भी न होते हुए भी वो मौज़ में रहता है, बादशाह होता है ......ऐसा मनुष्य अपने में तृप्त होता है। ......पैसे से कभी भी संतोष नहीं मिलेगा, ये जड़त्व स्थूल है.
प.पू.श्री माताजी, बम्बई, २४.९.१९७९
२. औदार्य (दानत्व का भाव) - दानत्व वाला आदमी जो होता है वो अपने भी संग्रह नहीं करता, दूसरों को बाँटता रहता है, देता रहता है, देने में ही लिये कुछ उसको आनन्द आता है, लेने में नहीं... व यह बताता नहीं, जताता नहीं, दुनिया को दिखाता नहीं कि मैंने उसके लिए इतना कर दिया, वो कर दिया, एकदम चुपके से करता है।
प.पू.श्री माताजी, नई दिल्ली, चैतन्य लहरी २००४
3. करुणा - अन्य सहजयोगियों के प्रति सहृदयता की संवेदनशीलता आप में विकसित होनी चाहिये। .....आपके अन्दर यदि किसी के लिये करुणा भाव है तो नि:सन्देह यह कार्य करता है।....मेरी करुणा मात्र मानसिक ही नहीं है, यह तो बहती है और कार्य करती है। आप भी ऐसे बन सकते हैं। मैं चाहती हूँ आप मेरी सारी शक्तियों को पा लें, परन्तु करुणा सर्वप्रथम है।
प.पू.श्री माताजी, आस्ट्रेलिया, २६.२.१९९५
Friday, October 2, 2020
Don't pamper negative thoughts!
नकारात्मक विचारों को मत पालें, समर्पण मात्र से ही बाधामुक्त हो सकते हैं।
हर समय यह सोचना कि, "मुझे क्या बाधायें हैं? मुझ में क्या नकारात्मकतायें हैं? इससे आपको कोई सहायता नहीं होने वाली । इस प्रकार के सभी विचार (ideas) जो आपके अंदर आ रहे हैं, उन्हें मात्र समर्पित कर दें, और आप देखेंगे कि ये सभी बेतुके (absurd) विचार भाग खड़े होंगे।
अपनी समस्याओं से पार पाने का यह सबसे आसान तरीका है। इन समस्याओं को मात्र समर्पित करें ।
आखिरकार, ये सभी भयानक लोग, सभी भयानक देवता, शत्रु , जो देवी से लड़ने सामने आए हैं, ये तब तक मौजूद रहेंगे, जब तक आप अपने नकारात्मक विचारों से इनका पोषण (nurture) करते रहेंगे ।
जैसे ही आप स्वयं को समर्पित कर देते हैं, वे अपने को किसी काम का नहीं पायेंगे, और वे आधे अधूरे लोगों के पास चले जायेंगे।
जब समर्पण पूर्ण हो जायेगा तो केवल विकास होगा।
प. पू. माता जी श्री निर्मला देवी ।
नवरात्रि पूजा, 19 Oct 1980
हैम्पस्टीड, लंदन, इंग्लैंड
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