Tuesday, February 20, 2024

Common ailments with Sahaja Yoga Treatment

 SAHAJAYOGA NIRMAL ASHRAM PATHARDI NASHIK


जय श्री माताजी - अति महत्वपूर्ण सूचना



कुछ कॉमन स्वास्थ्य समस्याओं के लिये 18 फरवरी 2024 को हुये नेडिकल के सेमिणार नासिक मे (डॉ.संदीप राय सर वं डॉ.मधुर राय मॅडम और डाॅ. अलका पानसरे मॅडम) सेमिनार में निम्न उपचार बताये गयेः- (किसी ग्रुप पर सहजयोगी भाई द्वारा पोस्ट किये गये उपचार)

(भाग-1)

1- प्रतिदिन फुटसोक करने से आपकी 90 प्रतिशत समस्यायें दूर हो जायेंगी।

2- सहजयोग में श्रीमाताजी ने हमें स्वयं का डॉक्टर बना दिया है।

3- यदि बहुत अधिक विचार आ रहे हों और आपको निर्विचारिता प्राप्त करने में कठिनाई हो रही हो तो अपना दांया हाथ नमक मिले बर्फ के पानी में डालें। 

4- आंखों के लिये श्रीमाताजी के हाथों के फोटो का उपयोग करें।

5. ध्यान के लिये माँ का अभय मुद्रा वाला चित्र रखें।

6- स्वास्थ्य समस्याओं के लिये माँ का धनवंतरी रूप फोटो रखें।

7- आज्ञा चक्र के लिये रोज दो बार हं और क्षं कहें।

8- दांई नाड़ी की समस्याओं जैसे फ्रैक्चर, हार्ट अटैक आदि के लिये पहले डॉक्टर के पास जांय।

9- बांई नाड़ी की समस्याओं के लिये जैसे साइकोसोमेटिक रोगों और स्कीजोफ्रेनिया के लिये एलोपैथी में कोई निदान नहीं है। इसका निदान सहजयोग में है।

10- जो लोग बीमार हैं उनके लिये मन में दयाभाव रखें। ये न कहें कि वह बीमार है और संभवतया वह सहजयोग ठीक से नहीं कर रहा है। उससे सहानुभूति रखें और उसका सहयोग करें। उसको श्रीमाताजी के प्रति समर्पण करवाने का प्रयास करें और उसे माँ से जोड़ें।

11- माँ ही हमारे लिये सही उपचार करेंगी चाहे वह एलोपैथी हो या होमियोपैथी, आयुर्वेद या सर्जरी। जितना अधिक आप माँ को पहचानेंगे उतनी ही जल्दी आप ठीक होंगे। 

12- हाइपर थाइरॉयड, डायबिटीज़ उच्च रक्तचाप के लियेः दांई नाड़ी के उपचार कीजिये। 

13- जो भी चीज हमारे ऑर्गन्स को लिथार्जिक बनाती हो जैसे शरीर में कोई ग्रोथ या दर्द या फिर मानसिक विकलांगताः हो तो इसके लिये बांई नाड़ी के ट्रीटमेंट दें।

14- यदि अति सक्रियता के कारण केवल बांई ओर वाइब्रेशन्स का अनुभव होता हो तो दांई नाड़ी को ठंडा करें।

15- सियाटिका के दर्द के लिये यदि दर्द बांई ओर हो तो बांई नाड़ी का उपचार और यदि दांई नाड़ी पर हो तो दांई नाड़ी को क्लियर करिये। 

16- कपूर शरीर को बाह्य रूप से गर्मी प्रदान करता है। अतः बांई नाड़ी के लिये कैंडल उपचार करें। यदि अत्यधिक लेफ्ट साइड की बाधा हो तो कैंडल के साथ कपूर ट्रीटमेंट भी दें।

17- डायबिटीज अत्यधिक सोचने और योजनायें बनाने के कारण होती है जिसमें स्वाधिष्छान चक्र हर समय कार्य करता रहता है और पैंक्रियाज में अत्यंधिक गर्मी चली जाती है। इसके लिये राइट स्वाधिष्ठान, लिवर व बैक आज्ञा पर बर्फ रखें। सब्जा के बीज पानी में भिगाकर पिंये, मूली की पत्तियां उबाल कर पियें, कोकम का शरबत पियें। 

बांझपनः अपना मेडिकल चेकअप करवायें। दांई नाड़ी को ठंडी रखें। दांया हाथ दांये स्वाधिष्ठान पर रखें। श्रीगणेश अथर्वशीर्षम का पाठ करें।

18- कान का दर्दः दांया कान राइट विशुद्धि है और बांया कान बांई विशुद्धि। इसके लिये विशुद्धि के मंत्र पढ़ें और घी कपूर ट्रीटमेंट करें। यदि बांई विशुद्धि है तो वाइब्रेटेड अजवाइन को एक बरतन या तवे पर गर्म करें और गर्म अजवाइन को एक रूमाल पर निकालें और इस पोटली से बांई विशुद्धि को सेकें। अल्लाहो अकबर का उच्चारण करें।

19- कमजोर स्मरण शक्ति के लियेः या देवी सर्वभूतेषु समृति रूपेण संस्थिता, गणेश अथर्वशीर्षम का पाठ करें।

20- पढाई करने से पहले भी माँ से प्रार्थना करें कि माँ आप ही साक्षात श्रीगणेश हैं ... आप ही श्री सरस्वती देवी हैं। कृपया आप मुझसे पढ़ाई करवा लीजिये।

21- आंख में अंजनियाः लेफ्ट विशुद्धि के कारण। प्रार्थना करें कि माँ मैं बिल्कुल भी दोषी नहीं हूँ। किसी छोटे बच्चे की तरह से माँ की साड़ी के धागे को पकड़ते हुये माँ से प्रार्थना करें और वही निश्चित रूप से आपकी देखभाल करेंगी। 

22- हार्ट अटैकः आत्मा, सहजयोग या सहजयोग के कार्यों की अनदेखी। चित्त आत्मा की ओर रखें। सब कुछ माँ पर ही छोड़ दें।

23- घुटनों ओर कोहनी का दर्दः नाभि को क्लियर करें। पारिवारिक समस्याओं के कारण लेफ्ट नाभि खराब हो जाता है। 

24- अधिक सोचने से दांई नाड़ी खराब हो जाती है। दांई नाड़ी के मंत्र पढ़ें।(क्रमशः)🌹


SAHAJAYOGA NIRMAL ASHRAM PATHARDI NASHIK

Saturday, March 18, 2023

Pratah Smarami Shloka - Hindi and English Meaning

 Sanskrit Shloka - - composed by Sri Adi Shankaracharya






प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् ।
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घः ॥१॥

मैं प्रातः काल, हृदय में स्फुरित हुए आत्मतत्व का ध्यान करता हूँ. जो सच्चिदानंद है,
परमहंसों का प्राप्य स्थान है और जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं से विलक्षण है, जो स्वप्न, सुषुप्ति
और जागृत अवस्था को नित्य जानता है, वह स्फुरणा रहित ब्रह्म ही मैं हूँ, पांच तत्वों का शरीर मैं नहीं हूँ।

Meaning:
1.1: In the Early Morning I remember (i.e. meditate on) the Pure Essence of the Atman shining within my Heart, ...
1.2: ... Which gives the Bliss of Sacchidananda (Existence-Consciousness-Bliss essence), which is the Supreme Hamsa (symbolically a Pure White Swan floating in Chidakasha) and takes the mind to the state of Turiya (the fourth state, Superconsciousness),
1.3: Which knows (as a witness beyond) the three states of Dream, Waking and Deep Sleep, always,
1.4: That Brahman which is without any division shines as the I; and not this body which is a collection of Pancha Bhuta (Five Elements).

प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं
वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण ।
यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचं_
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम् ॥२॥


रातःकाल मैं उसकी पूजा करता हूँ, जो मन और वाणी से परे है,
(और) जिनकी कृपा से सभी चमकते हैं,
जिसे शास्त्रों में “नेति नेति” कथन द्वारा व्यक्त किया गया है, क्योंकि उसे शब्दों द्वारा पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता है,
जिन्हें देवताओं का देवता, अजन्मा, अविनाशी और आदि पुरुष कहा गया है।

2.1: In the Early Morning I worship That, Which is beyond the Mind and the Speech,
2.2: (And) By Whose Grace all Speech shine,
2.3: Who is expressed in the scriptures by statement "Neti Neti", since He cannot be adequately expressed by Words,
2.4: Who is called the God of the Gods, Unborn, Infallible (i.e. Imperishable) and Foremost (i.e. Primordial).


प्रातर्नमामि तमसः परमर्कवर्णं
पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् ।
यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ
रज्ज्वां भुजङ्गम इव प्रतिभासितं वै ॥३॥


प्रातःकाल में मैं उस अन्धकार को प्रणाम करता हूँ, जो परम प्रकाश का स्वरूप है,
जो पूर्ण है, जो मूल निवास है, और जिसे पुरुषोत्तम कहा जाता है,
जिसमें यह संसार अनंत रूप से बसा हुआ है।

3.1: In the Early Morning I Salute That Darkness (signifying without any Form) which is of the nature of Supreme Illumination,
3.2: Which is Purna (Full), Which is the Primordial Abode, and Which is called Purushottama (the Supreme Purusha),
3.3: In Whom this endless World is settled endlessly (i.e. from the beginning of creation), ...
3.4: ... and (this endless World) appear like a Snake over the Rope (of the Primordial Essence).

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् ।
प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम् ॥४॥

ये तीन श्लोक, जो पवित्र हैं (एक को संपूर्ण के साथ जोड़ता है), 

और तीनों लोकों के आभूषण है,
जो प्रात:काल इस श्लोक का पाठ करता है, वह परमधाम को जाता है।


4.1: These three Slokas, which are Holy (unites one with the Whole), and the ornaments of the Three Worlds,
4.2: He who recites in the early Morning, goes to (i.e. attain) the Supreme Abode (of Brahman).

Friday, November 18, 2022

Maintain Love and Marriage - the Sahaja Way!

 जय श्री माताजी 

अभी कुछ दिनों से सहज शादियों के बारे में सुन रही थी, तो सोचा कि अपने विचार सामूहिकता के साथ साझा करूँ। हो सकता है ये विचार पूरी तरह से सही ना हो, तो आप भी अपने विचार रख सकते हैं, और मेरी गलतियों को सुधार सकते हैं । ये विचार उन लोगों के लिए शायद ज्यादा लाभकारी हो सकते हैं, जो सालों से अपनी शादी को जोड़े रखने की कोशिश करते हैं और जहां दोनों श्री माताजी को मानते हैं और सहज कार्य भी करते हैं। 



ऐसा नहीं है कि हमारे झगड़े बंद हो गए हैं, जैसे ही स्थिति नीचे आती है, जरूर होते हैं। लेकिन जो उनका permanent असर होता है आपसी रिश्ते पर, वह ज्यादा नहीं होता। 

करीब 20 वर्षों की शादी के बाद, कुछ चीजें समझ में आई हैं, वो निम्न-प्रकार से है-

1.श्री माताजी ने कई बार कहा है कि इन शादियों से बहुत महान आत्माएं जन्म लेंगी, जो आगे जाकर श्री माताजी के लिए बड़े-बड़े कार्य करेंगी। इसलिए negativities पूरी कोशिश करती हैं कि ये शादियाँ अच्छे से नहीं चले, जिससे या तो वे टूट जाएँ या फिर बच्चों को अच्छा वातावरण ना मिले और वे श्री माताजी के अच्छे यंत्र ना बन सकें। 

उदाहरण के तौर पर, जब भी कोई public prog हो, तो हमारा झगड़ा होना निश्चित था या फिर जब हम साकार पूजा के लिए जा रहे होते थे तब हम में से एक स्टेशन से ही वापिस जाने को तैयार रहता था। 

2.जो सहज शादियाँ होती हैं, तो पति-पत्नी में जो कमियाँ होती हैं, वो अधिकतर दो छोर होते हैं। जैसे-

a.एक को खर्चा करना पसंद है, तो दूसरा बचत को लेकर चिंतित है। 

b.एक खाने के स्वाद को ले कर particular है, तो दूसरे को खाना बनाना आता ही नहीं 

c.एक को घूमना अच्छा लगता है, तो दूसरे को बिल्कुल भी नहीं। 

सिर्फ इतना ही नहीं, अगर एक बहुत अधिक अति में है, तो दूसरा भी उतने ही अति में होगा और वे एक दूसरे को खींच के संतुलन में लाएंगे। 

अतः अगर आप अपने जीवनसाथी को संतुलन में लाना चाहते हैं, तो पहले खुद को भी introspection करके संतुलन में लाना होगा, दूसरा अपने आप आ जाएगा।

3.कुछ लड़ाइयाँ शायद बहुत गंदी भी हो, लेकिन इनका परिणाम अंत में बुरा नहीं हो, इसके लिए मेरे निम्नलिखित सुझाव हैं-

a.Introspection – दूसरों की कमियाँ देखते रहने की बजाय, कोशिश करें कि अपनी कमी देखें और उनको सुधारने का प्रयत्न करें। ये हमेशा शायद संभव ना हो, लेकिन अगर हम लड़ाई के बाद भी ऐसा करें, तो भी परिस्थियाँ सुधरेंगी।  

b.Detachment – ये बड़ा ही tricky शब्द है, विशेषकर जीवनसाथी के लिए, क्योंकि पूरा जीवन तो उसी व्यक्ति के साथ गुजारना है, उसी से प्रेम की आकांक्षा है और दुख में उसी का सहारा होगा, अगर detach हो गए तो काम कैसे चलेगा। 

Detach होने से काम चले ना चले, एक चीज जरूर आ जाएगी, दूसरे की उन आदतों पर reaction जरूर खत्म हो जाएंगे, और अपने अंदर शांति आ जाएगी। और ये तो हमने ना जाने कितने lectures में सुना है कि जब हम detach हो जाते हैं, तो गण उस कार्य को करते हैं। 

एक उदाहरण देती हूँ, मेरे पति जब job से वापिस आते थे, उनके footsoak को ले कर हमारा झगड़ा हो जाता था। फिर एक दिन मैंने introspection किया कि माँ तो कहती है, जब पति काम से थक कर आए तो प्रेम से बात करो, मैं रोज झगड़ा करती हूँ। अगर किसी और का पति ऐसे करता तो क्या मैं उस पर गुस्सा करती? नहीं, मैं नहीं करती। लेकिन क्योंकि मुझे मेरे पति से attachement है, इसलिए मैं ऐसा करती हूँ, तो मैंने उसी दिन जा कर shoebeating करी, अपने पति की नहीं, बल्कि अपने पति से अपने attachment की । 

मेरी स्थिति बहुत अच्छी हो गई, नहीं तो उनके office से आते ही मेरी स्थिति खराब हो जाती थी। 2-3 बाद उनको मैंने बताया, तो वे कहते हैं, अब मुझे समझ में आया कि office से आते ही मेरी स्थितिइतनी खराब क्यों हो जाती है कि मुझे footsoak करना ही पड़ता है। 😂

  4. लेकिन introspection करना और detach होना आसान नहीं होता। इसलिए कुछ चीजें आपसे साझा कर रही हूँ, जो हमने इन वर्षों में इन लड़ाइयों से ऊपर उठने के लिए किया है, वो निम्न-प्रकार से है-

a.Footsoak- स्वयं रोज footsoak करें। दूसरा अगर नहीं कर रहा है, तो श्री माताजी से प्रार्थना करें। 

b.Treatment- अपने चक्रों के लिए सावधान रहे, अगर कोई चक्र ज्यादा पकड़ रहा है या बार-बार पकड़ रहा है, तो उसका treatment जो भी श्री माताजी ने बताया है उसे जरूर करें। बहुत से लोग आलस करते हैं candelling, shoebeating, अल्लाह हु अकबर, मटका, paper burning, camphoring इत्यादि करने में। 

आलस ना करें। ये हथियार हैं जो श्री माताजी ने ही बताए हैं, इनका उपयोग जरूर करें।

c.Mother’s Lectures - श्री माताजी की speeches नियमित रूप से सुने। अधिकतर उनमें हमारे introspection के लिए जरूर कुछ कहा होता है, हमें अपने लिए सुनना है, न कि दूसरे के लिए।  

d.Vibration Exchange – एक दूसरे को अक्सर vibrations दें, head massage करें। जो left-sided होता है, उसे सहायता की जरूरत होती है, और right-sided वाले को दूसरे की मदद करनी चाहिए।

e. Health centre ज़रूर जाएँ, मैंने देखा कि जब बहुत देर हो जाती है, बुरे विचार मन में घर कर लेते हैं, तब लोग health centre जाते हैं, divorce से एकदम पहले last chance की तरह। नहीं, शुरू से ही जाएँ, चाहे तो हर वर्ष जाएँ, एक बार जाने से कुछ नहीं होगा। और आने के बाद भी अपने ऊपर मेहनत करनी होगी।

ध्यान सर्वोपरि है, लेकिन ध्यान लगेगा ही नहीं तो कैसे काम चलेगा। ये सब चीज़े ध्यान में जाने में सहायक होंगी।

Tuesday, October 18, 2022

The names of Shri Dhanvantari

 The names of Shri  Dhanvantari 



1. Shrī Dhanvantaraye

Lord Dhanvantari

2. Shrī Sudha-purṇa-kalashāḍhya-karāya

 The Lord who holds a pot filled with nectar in his hands.

(signifying true knowledge)

3. Shrī Haraye

Shri Hari(Kṛshṇa)

4. Shrī Jarā-mṛti-trasta-deva-prarthanā-sādhakāya

He who fulfills the prayers of the divine beings frightened of old

age and death.

5. Shrī Prabhave

Lord of all beings

6. Shrī Nirvikalpāya

The one whose powers absorb the ideas of separation and

differentiation, and take us beyond doubt (doubtless-awareness)

with complete peace.

7. Shrī Nissamānāya

A matchless being who is the incomparable essence of all

existence.

8. Shrī Manda-smita-mukhāmbujāya

The one who sports a captivating smile on His lotus face.

9. Shrī Āñjaneya-prapitādraye

He who helped Shri Hanuman in locating the mountain with

medical herbs.

10. Shrī Pārshvastha-Vinatā-sutāya

By whose side Garuda, the divine condor (the son of Vinatā)

is always present (indicating sharp eyesight to see every activity in

the universe).

11. Shrī Nimagna-manthara-dharāya

The one who uplifted the sunken Manthara mountain.

12. Shrī Kūrma-rūpiṇe

He who assumed the form of tortoise.

(indicating slow, steady but persistent approach)

13. Shrī Bṛhattanave

He who possesses a gigantic body

(the entire universe makes up His body)

14. Shrī Nīla-kuñchita-keshāntāya

 He whose hair ends in bluish curls.

15. Shrī Paramādbhuta-rūpa-dharāya

The one who has assumed the most astonishing form.

16. Shrī Katāksha-vīkshaṇa-trasta-vāsukaye

The one who frightened Vasuki(the king of snakes) by a mere

glance.

17. Shrī Siṅh-vikramāya

He who exhibits the valor of a lion.

18. Shrī Smartṛ-hṛdroga-haraṇāya

He who cures the diseases of the heart of those who remember

Him.

19. Shrī Mahā-viṣhṇvaoṅsh-sambhavāya

The one who is an incarnation of Shri Vishnu.

20. Shrī Prekshaṇīyotpala-shyāmāya

The hue of the body of the Lord resembles the blue water lily.

21. Shrī Āyurvedādi-daivatāya

The presiding deity of Āyurvedā

22. Shrī Bheṣhaja-grahaṇād-eva-smaraṇīya-padāmbujāya

The one whose lotus feet are to be remembered in the very act of

consuming medicines.

23. Shrī Nava-yauvana-sampannāya

He who possesses an ever fresh youthfulness.

24. Shrī Kirītañchita-mastakāya

He whose forehead is covered with a crown.

25. Shrī Namra-kuṇdala-saoṅshobhi-shravan-dvaya-shaṣhkulaye

The one whose ears glitter with drooping earrings.

26. Shrī Dīrgha-pīvara-dordaṇḍāya

He who has long and huge arms.

27. Shrī Kambu-grīvāya

He whose neck is enclosed in a shell(as a tortoise)

28. Shrī Ambujekshaṇāya

He whose eyes resemble the shape of the lotus petal.

29. Shrī Chaturbhujāya

The one who has four arms

30. Shrī Shaṅkha-dharāya

The one who holds a conch

31. Shrī Chakra-hastāya

The one who wields a discus

32. Shrī Vara-pradāya

He who bestows boons

33. Shrī Sudhā-patra-upari-lasadāmra-patra-lasadkarāya

He who holds in his hands a pot of nectar covered by mango

leaves.

34. Shrī Shata-patrāḍhya-hastāya

He who holds a lotus flower in his hands

35. Shrī Kastūrī-tilakañchitāya

He who applies musk paste on the forehead at the Agnya Chakra.

36. Shrī Su-kapolāya

He who has well formed cheeks

37. Shrī Su-nāsāya

The one who has a well shaped nose

38. Shrī Sundara-bhrū-latāñchitāya

The one who has beautiful and elongated eyebrows resembling a

creeper.

39. Shrī Svaṅgulī-nakha-shobhāḍhyāya

The one who glows with glitter of his own fingernails.

40. Shrī Gūḍha-jatrave

He whose neck is hidden

41. Shrī Mahā-hanave

He who has a big jaw

42. Shrī Divyāṅgada-lasadbāhave

He whose hands shine with the glow of his splendid bracelets.

43. Shrī Keyūra-parishobhitāya

He who is decorated with various ornaments.

44. Shrī Vichitra-ratna-khachita-valaya-dvaya-shobhitāya

He who wears two bangles adorned with a variety of precious

gems.

45. Shrī Samullasat-sujātā-aoṅsāya

The one who displays well formed aoṅsa(shoulder blades)

46. Shrī Aṅgulīya-vibhūṣhitāya

The one whose fingers are decorated with rings.

47. Shrī Sudhā-gandha-rasāsvāda-milatbhṛṅg-manoharāya

(As the Lord holds a pot of nectar in his hand) He is surrounded by

bees enjoying the fragrance of ambrosia.

48. Shrī Lakshmī-samarpitotphulla-kañja-mālā-lasatgalāya

He whose neck is decorated with the garland made of blossomed

lotus flowers offered by Goddess Lakshmi.

49. Shrī Lakshmī-shobhita-vakshaskāya

He whose chest exhibits the affluence of Goddess Lakshmi.

50. Shrī Vana-mālā-virājitāya

He who glows in the luster of a garland made of forest flowers.

51. Shrī Nava-ratna-maṇi-kḹpta-hāra-shobhita-kandharāya

He whose neck glitters with the necklace made of nine precious

gems.

[Diamond(Vajra),Pearl(Muktā),Ruby(Māṇikya),

Blue-sapphire(Indranīl), Emerald(Marataka), Hessonite(Gomedaka),

Yellow-Sapphire(Puṣhyrāj),Cat's eye(Vaidurya),Coral(Pravāl)]

The nine gems can counteract the ill-effects of the nine planets.

52. Shrī Hīra-nakshatra-mālādi-shobhā-rañjita-diṅmukhāya

He whose face radiates with the glow of diamonds and other

jewellery.

53. Shrī Vārijāmbara-saoṅvītāya

He whose garments are woven out of fine silk and made out of a

lotus stalk.

54. Shrī Vishalorase

The one who has a broad chest indicating masculine prowess.

55. Shrī Pṛthu-shravase

The one who has broad ears

(symbolic indication that He has extraordinary power to hear the

prayers of His devotees)

56. Shrī Nimna-nābhaye

 The one who has a sunken umbilicus indicating perfect physique.

57. Shrī Sūkshma-madhyāya.

He who has a shrunken belly.

58. Shrī Sthūla-jaṅghāya

The one who has prominent calf muscles.

59. Shrī Nirañjanāya

He who is free from all blemishes. He is a symbol of pristine purity.

60. Shrī Sulakshaṇa-padāṅguṣhthāya

The one whose big toe exhibits all the auspicious signs.

61. Shrī Sarva-sāmudrikānvitāya

He whose entire body is an expression of the auspicious physical

traits.

62. Shrī Alaktakā-rakta-pādāya

The one whose feet are red like the hue of lac.

63. Shrī Mūrtāya

He who possesses a tangible form

64. Shrī Madhvartha-pūjitāya

He who is worshipped for obtaining ambrosia.

(nectar which gives freedom from disease and death)

65. Shrī Sudhārthānyonya-sañyudhyad-deva-daiteya-sāntvanāya

He who pacifies Gods and demons fighting with each other to grab

the nectar of immortality.

66. Shrī Koti-manmatha-saṅkāsha-sarvāvayava-sundarāya

He who resembles a thousand cupids(God of love) with all his bodyparts well formed.

67. Shrī Amṛtāsvādanodyukta-deva-saṅgha-parivṛtāya

He who is surrounded by the group of Gods eager to taste the

nectar of immortality.

68. Shrī Puṣhpa-varṣhana-saoñyukta-gandharva-kula-sevitāya

Gandharvas constantly unite to shower flowers upon Him.

69. Shrī Shaṅkha-turya-mṛdangādi-vāditra-āḍhyā-apsarovṛtāya

The Lord is surrounded by celestial nymphs(apsaras), who play

musical instruments like Shaṅkha(conch), turya(wind instrument),

mṛdanga(percussion) etc.

70. Shrī Viṣhvaksenādi-yuk-pārshvāya

He who is accompanied by commanders like Viṣhvaksenā.

71. Shrī Sanakādi-munistutāya

He who is praised by sages like Sanaka.

72. Shrī Sāshcharya-sasmita-chaturmukha-netra-samīkshitāya

The one who is so perfect that even Lord Brahma looks at Him with

great astonishment unable to hide His smile.

73. Shrī Sashaṅka-sambhrama-ditidanu-vaoñshya-samīditāya

He who is praised even by the demoniac offsprings of Diti who are

gripped with doubts and confusions.

74. Shrī Namanonmukha-devādi-mauli-ratna-lasatpadāya

He whose feet radiate the luster of gems on the crowns of the Gods

who are prostrating before Him.

75. Shrī Divya-tejah-puñja-rūpāya

He who is radiant divine luster.

76. Shrī Sarva-deva-hitotsukāya

He who is eager for the welfare of Gods.

77. Shrī Sva-nirgama-kshubdha-dugdha-vārāshaye

He who emerged from the milky ocean creating great disturbance.

78. Shrī Dundubhi-svanāya

His voice resembles the sound of Dundubhi(divine drum)

79. Shrī Gandharva-gītā-padān-shravanotka-mahā-manase

He who is eager to listen to the music and songs of the

Gandharvas.

80. Shrī Nishkiñchan-jana-prītāya

He who is pleased by the offering of the deprived.

81 Shrī Bhava-samprāpta-roga-hṛte

The Lord who removes the diseases created by contact with the

transient world.

82. Shrī Antarhita-sudhā-pātrāya

The pot of ambrosia in His hand is kept concealed

(and becomes visible only to true aspirants and devotees)

83. Shrī Mahātmane

The great one

84. Shrī Āmnāyakāgraṇye

He who is the forerunner of the Vedas

85 Shrī Kshaṇāpta-mohinī-rūpa-sarva-strī-shubha-lakshaṇaya

He who instantly took the form of Mohini- symbolising

delusion(Māyā) with all the auspicious signs of feminine beauty.

86. Shrī Mada-mattebha-gamanāya

He who walks like a majestic elephant

87. Shrī Sarva-loka-vimohanāya

He who enchants the whole world

88. Shrī Straoṅsan-nīvī-granthabandha-sakta-divya-karāṅgulaye

The one whose divine fingers hold together the loosening folds of

His garment tucked into the waistband.

89. Shrī Ratna-darvī-lasaddhastāya

He who holds a ladle made of gems

(to distribute the nectar of immortality who seek refuge at Him)

90. Shrī Deva-daitya-vibhāgakṛte

He who distinguishes between demons and Gods

91. Shrī Saṅkhyāta-devatā-nyāsāya

He who is worshipped by the proper placement of various aspects

of divinity in the worshipper.

92. * Daitya-dānava-vañchakāya

He who deceives the demoniac ascendants of Diti.

93. Shrī Devāmṛt-pradātre

He who distributes nectar of immortality to Gods.

94. Shrī Pari-veṣhṭaṇa-hṛṣhtadhiye

He who is pleased when adorned with clothes.

95. Shrī Unmukhāya

The one whose face is raised upward (indicating He is always ready to act)

96. * Unmukha-daityendra-danta-paṅkti-vibhājakāya

He who severed the row of teeth on the raised face of the king of

demons.

97. * Puṣhpavanta-vinirdiṣhta-rāhu-raksh-shshiro-harāya

He who severed the head of demon Rahu at the instruction of sun

and moon.

98. * Rāhu-ketu-graha-sthana-pashchāt-gati-vidhāyakāya

He who ordained retrograde movements of shadow planets Rahu

and Ketu.

99. Shrī Amṛtā-lābha-nirviṇṇa-yudhdhad-devāri-sūdanāya

He who destroyed the enemies of Gods who were after the nectar

of immortality.

100. Shrī Garutma-vāhanārūḍhāya

He who rides the condor known as Garuḍa.

101. Shrī Sarva-shastrastra-sañyutāya

He who is equipped with all weapons and destructive instruments

(to eliminate negativities).

102. Shrī Sva-svādhikāra-santuṣhta-shakra-vahnyadi-pūjitāya

He who is worshipped by Indra, Agni and other Gods who are

happy to perform their allocated duties.

103. Shrī Mohinī-darshana-āyāta-sthaṇu-chitta-vimohakāya

His Mohini form deluded everybody who came to see Him.

104. Shrī Shachī-svāhādi-dikpāla-patnī-maṇdala-sannatāya

The one who is surrounded by Shachi (wife of Indra),

Svaha (wife of Agni), the wives of the guardians of directions and

others.

105. Shrī Vedānta-vedya-mahimne

He whose glory can be understood by the study of Vedānta.

106. Shrī sarva-lokaikarakshakāya

He who is the sole guardian of the entire Universe.

107. Shrī raja-raja-prapūjyāṅghraye

He whose feet are worshipped by the king of kings.

108. Shrī Chintitārtha-pradāyakāya

He who grants what one wishes for.

Sākshāt Shrī ĀdiShakti Mātājī Shrī Nirmalā Devyai Namo Namah

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Stay Away from Negativity

 जय श्री माताजी

         "दूर रहो। दूर रहो क्योंकि अब तुम सब शुद्ध हो गए हो। जो शुद्ध हैं वे गंदे लोगों के साथ नहीं मिलते हैं, है नाऔर इसलिए आपके दिमाग में यह समझने के लिए इतना ज्ञान होना चाहिए कि किसी भी कीमत पर आप गंदे लोगों के साथ नहीं मिलेंगे, है ना? और इसलिए आपके दिमाग में यह समझने के लिए इतना ज्ञान होना चाहिए कि आप किसी भी कीमत पर सहज योग को अन्य चीजों के साथ नहीं मिलाएंगे। जानना बहुत जरूरी है। मैं बहुत दिनों से यही बताने की कोशिश कर रहा था कि खुद को दूर रखो। लेकिन कई बार लोग ऐसा नहीं करते हैं और फिर उन्हें काफी तकलीफ होती है।

हमारे पास सभी प्रकार के शैतान हैं, सभी प्रकार की शैतानी ताकतें किसी न किसी पंथ के रूप में कार्य कर रही हैं, या मुझे नहीं पता कि वे क्या कर रहे हैं, उन्होंने लोगों का कोई भला नहीं किया है, कुछ भी अच्छा नहीं किया है। जरा देखिए कि उन दिनों क्या चल रहा था: हर तरह की लड़ाई, झगड़ा, हत्या है। यह सब चल रहा है, इसलिए आपको पता होना चाहिए कि हम कलियुग के बहुत बुरे प्रकार में हैं और हमें इसे सामूहिक रूप से लड़ना होगा।

       बच्चों को देखो, वे कितने सामूहिक हैं। आप सभी को सामूहिक होना चाहिए और आपको सभी लोगों से, सभी सहजयोगियों से, जो आसपास हैं, प्रेम करना चाहिए। उनमें दोष न ढूंढ़े। उनसे मत लड़ो क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण काम है जो मैं कर रहा हूं।

       मैं जो करने की कोशिश कर रहा हूं वह लोगों को बदलना है, उन्हें अच्छा इंसान बनाना है, अच्छे इंसान बनाना है। यह उनसे बाहर निकलने के लिए नहीं है, बल्कि उन्हें कुछ देने के लिए है कि वे बहुत अच्छे इंसान बन जाएं। हमारे पास बहुत अच्छे और अच्छे लोग होने चाहिए, वे लोग जो नफरत नहीं करते, वे लोग जिनमें लालच नहीं है।"

जर्मनी। 27-09-2002.


Jai Shree Mataji

         " Keep away. Keep aloof because now you all have been cleansed. Those who are cleansed people don't mix up with people who are muddy,do they ? And so must have this much of wisdom in your head to understand that at any cost you will not mixup with people who are muddy, do they ? And so must have this much of wisdom in your head to understand that at any cost you will not mixup Sahaja Yoga with with other things. It is very important to know. I have been trying to tell this since long that keep yourself aloof. But sometimes people don't do it and then they suffer a lot.

           We have all kinds of devil's around, all kinds of satanik forces acting as some sort of a cult, or i don't know what they're doing, they have done no good to people, no good at all. Just see what is going on in those days: is all kinds of fighting, quarrelling, killing. All this is going on, so you must know we are in the very very bad type of Kali Yuga and we have to fight it out by collectivity.

       Look at the children, how collective they are. You all have to be  collective and you must love all the people, all the Sahaja Yogis who are around. Do not find faults with them. Don't fight with them because it is very important work I am doing. 

       What I am trying to do is to transform people, to make  them  good people, nice people. It is not to get out of them, but to give them something that they should become very good people. We have to have extremely good and nice people, people who do not hate, people who do not have greed."

Germany. 27-09-2002.

Thursday, September 29, 2022

Ingredients for Sahaja Yoga Havan

॥ हवन हेतु लगने वाली सामग्री ||


20-25 ईटें, रेत, काली मिट॒टी (उपयुक्त मात्रा मैं) |

रंगौली, हल्दी, कुंकुम, अक्षदा, नारियल -2 |


पांच तरह के फल (कैला और खट्टे फल छौडकर)।


सूखा मेवा - 7 प्रकार कै |


तीन किलो लकडी, उपला (कण्डा) , आधा किलो कपूर,


3 किली घी, ।- चम्मच लम्बी डंडी वाला (हवन हैठु )।


हवन सामग्री 5 किलौ, साबुत धान नौ तरह के (उडढ, छोले , काला चना, राजमा , मुंडा, मौठ, मसुर आदि) ।


तिल काले व सफैढ, अजवाईन, चंदन पावडर, लौह॒बान, ग़ुग्गल (ये सारा सामान एक कटोरी भरकर कम सै कम) |


बेल फल या नारियल को घी लगाकर अलग थाली मैं रखें। 


हवन का भात - ये चावल साफ धौकर उसमें दूध, घी तथा सूखा मेवा डालकर पकाया जाता है। एक मुट्ठी चावल मै उसी मात्रा के अनुसार दूध, घी डालकर पकाये।


फूल थौडै सै, श्रीमाताजी कै लिये हार + ह॒वनंकुंड कै लिये हार कुल 4 हार ले (जब पूजा हवन साथ हो तब) ।


हवन कुंड के अंदर मध्य में रांगीली से स्वास्तिक तथा इटीं के चारो तरफ - स्वास्तिक व फल रखी जाते है। रंगीली सै हवनकुंड चारो ओर सै सजाया जाता है |



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Ingredients for Havan :

20-25 bricks, sand, black soil (in suitable quantity).

Rangoli, Haldi, Kumkum, Akshada, Coconut-2 |

Five types of fruits (except banana and citrus fruits).

Dry fruits - 7 types

Three kilos of wood, upla (kanda), half a kilogram of camphor,

3 kilos of ghee, .- spoon with long stick (for Havan ).

Havan material is 5 kg, nine types of whole grams (Urad, Chole, Black gram, Rajma, Munda, Mauth, Lentil etc.).

Sesame seeds - black and white, carom seeds, sandalwood powder, lohbaan, guggal (all these things fill a bowl at least).

Apply ghee to bael fruit or coconut and keep it in a separate plate.

Havan ka Bhaat - This rice is cleaned and cooked by adding milk, ghee and dry fruits to it. Cook a handful of rice by adding milk, ghee according to the same quantity.

Some flowers  garland for Shri Mataji + garlands for Havanankund, take a total of 4 garlands (when puja is with Havan).

In the center of the havan kund, a swastik symbol is drawn and around the bricks also swastik is drawn and fruits are kept and sides are decorated with the help of rangoli


Thursday, September 15, 2022

Take care of liver - Hindi Article

 श्री माताजी की दिव्य वाणी 

 गुरू तत्व जो है वो इन तीनों शक्तियों, महाकाली, महालक्ष्मी महासरस्वती, इन तीनों शक्तियों का समन्वय है और ये नूतन स्वरूप परमात्मा ने हमारे अंदर समाई हुई है, जिस तरह से तीनों शक्तियां, ब्रह्मा विष्णु महेश जब पावित्र्य के सामने जाकर खड़ी हो गयी तो उस पावित्र्य ने उनको वो नूतनता, उनका भोलापन दे दिया, वो भोलापन से भरी हुई हैं ये तीनों शक्तियां जो हैं वो एक दत्तात्रेय जी के अंदर समाई हुई हैं, वो हमारे भवसागर में समाई हुई हैं।

हम किस तरह से अपने गुरु तत्व को कैसे मारते हैं ये मैं आपको बतलाऊंगी, किस तरह से हम अपने गुरु तत्व को हर समय खराब करते हैं, एक तो गुरू तत्व में हमारे अंदर जो चेतना है इसको संभालने वाला हमारा लीवर (यकृत) है, जब तक हमारा यकृत ठीक रहेगा, हमारी चेतना ठीक रहेगी और जैसे ही हमारा यकृत खराब हो जाता है, हमारा पित्त खराब हो जाता है।

दुष्ट आदमी के यहाँ और किसी गलत जगह खाना खाने से आपको बहुत तकलीफ हो सकती है, लीवर की खराबी से गुरू तत्व खराब होता है। 🌀🧘🏻‍♀️


 "भवसागर, गुरू तत्व का महत्व"🔱🚩

गुरू तत्व और श्री कृष्ण की शक्ति 

26 सितम्बर 1979

मुम्बई