Tuesday, January 19, 2021

Excerpt from conversation with Shri Mataji - Dharamsala March 1985.

 Excerpt from conversation with Shri Mataji during her visit to Dharamsala March 1985.


“If you want to see God just look at this beautiful nature created by him. This Himalaya is a swayambhu created by mother earth to emit vibrations.

Q. Do the swayambhus also absorb vibrations?

No.

Q. How do vibrations emit?

For the vibrations to act there has to be a co-efficiency. Vibrations have an absolute coefficient. Thus this co-efficiency emits vibrations. Only God and humans have this co-efficiency that emits vibrations.

Q. What is the co-efficiency in humans?

In the human cell Electrons and Protons have mesons, and that co-efficiency absorbs vibrations.

Q. Are these vibrations similar to what modern physics talks about?

No. the vibrations in physics are only electromagnetic. Electro comes from sun and magnetic comes from the earth. They are present in the centre of the mesons, but mesons act under the Adi Shakti. Her vibrations flow through it and are the pure vibrations which you feel as the cool vibrations of your kundalini. These vibrations are conscious, they act and organize everything, and above all they love. Love gives joy.

Question on creation?

We have 3 types of creations;

1 the universe

2 Animals and trees - they are under the Pash (control) of God.

3 Humans - they are arbitrary (have free will).

Q. Do human beings influence nature?

Yes, through vibrations. Mesons are arbitrary and can control nature. If you want to stop rain, the mesons act and the rain stops.

Q. Can human beings also influence animals?

Human beings are the only ones who can use vibrations. If you give vibrations to animals you can change them.

Q. Can the divine influence us?

The divine works through mesons, and through them the divine vibrations channel through human beings.

Q. Can bhoots also use vibrations to influence us?

No. bhoots cannot use vibrations. Only mesons can use vibrations and they are under the control of Adi Shakti. Bhoots only use bhoots.

Q. How to absorb left side vibrations?

Lemons absorb the left sided vibrations the best.

Q. The other day you gave us vibrated channas to clear our nabhis.

Anything that I touch becomes vibrated and starts clearing you.

Thank you Shri Mataji for your pearls of wisdom!!!

Shri Mataji: May God Bless You.

(Courtesy : Nicoleta Camelia Turtoi)



Monday, January 4, 2021

Chakra Clearing Techniques - Hindi Article

 ........ जब चक्रों में दोष हो जाता है तभी आप बीमार पड़ जाते हैं। अब अगर आप बाहर से किसी पेड़ को, उसके फूलों को उसके पतों को दवा दें तो थोड़ी देर के लिये तो वे ठीक हो  जायेंगे फिर सत्यानाश हो जाएगा, पर अगर उनकी जड़ में जो चक्र हैं उन चक्रों को अगर आप ठीक कर दें तो बीमार पड़ने की कोई बात ही नहीं। 

प॰ पू॰ श्रीमाताजी


.......... ध्यान देने से आपको पता लगेगा की आपके अंदर कौन से चक्र की पकड़ है, उसे आपको साफ करना है। इसको प्रत्याहार कहते हैं, माने इसकी सफाई होनी चाहिये। 

प॰ पू॰ श्रीमाताजी


.......... मध्य के पांचों चक्र मूलतः भौतिक तत्वों के बने हैं तथा पांचों तत्वों से इन चक्रों का शरीर बना है। हमें पूर्ण सावधानी से इन पांचों चक्रों का संचालन करना चाहिये। जिन तत्वों से ये चक्र बने हैं उन्हीं में इनकी अशुद्धियों को निकाल कर इन चक्रों का शुद्धीकरण करना है। 

प॰ पू॰ श्रीमाताजी, 18.1.1983

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........चक्र कुप्रभावित होने पर सम्बन्धित देवता वहाँ से स्थान त्याग कर देते हैं, अतः उस चक्र का मंत्र उच्चारण करके परम्पूज्य श्रीमाताजी के नाम की शक्ति से उस देवता का आवाहन किया जाता है। उपचार के लिये विपरीत पाश्वॅ का हाथ प्रभावित चक्र पर रखें और प्रभावित पाश्वॅ का हाथ फोटो की ओर फैलायेँ। 

प॰ पू॰ श्रीमाताजी, निर्मला योग, जुलाई-अगस्त, 1983

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......... ऐसा नहीं है कि सहजयोग में आने के बाद आपको कोई बीमारी ही नहीं होती है, कारण यह है कि सहजयोग में आने के बाद जो ध्यान-धारणा और प्रगति आपने करनी होती है, वो आप नहीं करते। फिर भी आपके कष्ट घट जाते हैं। 

........ सहजयोग में आने के बाद एक महीने में ही आप पूरी तरह से सहजयोग को समझ सकते हैं और उसमें उतर भी सकते हैं, पर जिस प्रकार रोज हम लोग स्नान करके अपने शरीर को साफ करते हैं, उसी प्रकार रोज अपने चक्रों को भी आपको साफ करना पड़ेगा। 

प॰ पू॰ श्रीमाताजी, दिल्ली, 2.3.1991


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........यदि आपकी विशुद्धि चक्र में कोई पकड़ है तो अपना दायाँ हाथ फोटो कि ओर करें और बाँया हाथ बाहर कि ओर कर दें। जब आपको लगे कि इसमें चैतन्य लहरियाँ आ रही हैं तब अपना बाँया हाथ फोटो कि ओर कर लें और दायाँ हाथ बाहर कि ओर, आपका पूरा चक्र स्वच्छ हो जाएगा। 

अपनी खुली आंखो से यदि आप मेरी फोटो को देखते हैं और अपने दोनों हाथ हथेलियाँ ऊपर की ओर करके फोटो की ओर फैलाते हैं या कभी-कभी आकाश की ओर उठाते हैं, तो आपकी दृष्टि में बहुत सुधार होगा। 

पृथ्वी माँ भी, यदि आप अपना सिर पृथ्वी माँ पर रखे, केवल अपना माथा पृथ्वी पर टेक लें और कहें, 

“हे पृथ्वी माँ, मैं आपको अपने पैरों से छूता हूँ, इसके लिये मुझे क्षमा करें।“ वो दादी माँ हैं, जो भी कुछ आप उनसे मांगेंगे वो आपको मिल जायेगा। सब आपकी इच्छानुरूप आपको देने के लिये प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

आप श्री हनुमान और श्री गणेश की सहायता भी माँग सकते हैं। 

प॰ पू॰ श्रीमाताजी, मुंबई, 22.3.1977



Saturday, December 19, 2020

The science of the Subtle System - Hindi Artic;e

 शरीर_विज्ञान व अष्टचक्र : अष्टांग योग का चक्रों से संबंध

आयुर्वेद में बताया गया है कि जीवन में सदाचार को प्राप्त करने का साधन योग मार्ग को छोड़कर दूसरा कोई नहीं है। नियमित अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही योग के संपूर्ण लाभ को प्राप्त किया जा सकता है। हमारे ऋषि मुनियों ने शरीर को ही ब्रम्हाण्ड का सूक्ष्म मॉडल माना है। इसकी व्यापकता को जानने के लिए शरीर के अंदर मौजूद शक्ति केन्द्रों को जानना ज़रूरी है। इन्हीं शक्ति केन्द्रों को ही ‘’चक्र कहा गया है।


#अष्टचक्र


आयुर्वेद के अनुसार शरीर में आठ चक्र होते हैं। ये हमारे शरीर से संबंधित तो हैं लेकिन आप इन्हें अपनी इन्द्रियों द्वारा महसूस नहीं कर सकते हैं। इन सारे चक्रों से निकलने वाली उर्जा ही शरीर को जीवन शक्ति देती है। आयुर्वेद में योग, प्राणायाम और साधना की मदद से इन चक्रों को जागृत या सक्रिय करने के तरीकों के ब्बारे में बताया गया है। आइये इनमें से प्रत्येक चक्र और शरीर में उसके स्थान के बारे में विस्तार से जानते हैं।


Contents


1 आठ चक्रों का वर्णन :

1.1 1- मूलाधर चक्र :

1.2 2- स्वाधिष्ठान चक्र :

1.3 3- मणिपूर चक्र :

1.4 4- अनाहत चक्र :

1.5 5- विशुद्धि चक्र :

1.6 6- आज्ञा चक्र :

1.7 7- मनश्चक्र- मनश्चक्र (बिन्दु या ललना चक्र) :

1.8 8 – सहस्रार चक्र :

2 योग और अष्टचक्र का संबंध :

3 योग क्या है :

4 महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग :

4.1 1- यम :

4.1.1 अहिंसा :

4.1.2 सत्य :

4.1.3 अस्तेय :

4.1.4 ब्रम्हचर्य :

4.1.5 अपरिग्रह:

4.2 2- नियम :

4.3 3- आसन :

4.4 4- प्राणायाम :

4.5 5- प्रत्याहार :

4.6 6- धारणा :

4.7 7- ध्यान:

4.8 8- समाधि :

आठ चक्रों का वर्णन :

1- मूलाधर चक्र :

यह चक्र मलद्वार और जननेन्द्रिय के बीच रीढ़ की हड्डी के मूल में सबसे निचले हिस्से से सम्बन्धित है। यह मनुष्य के विचारों से सम्बन्धित है। नकारात्मक विचारों से ध्यान हटाकर सकारात्मक विचार लाने का काम यहीं से शुरु होता है।


2- स्वाधिष्ठान चक्र :

यह चक्र जननेद्रिय के ठीक पीछे रीढ़ में स्थित है। इसका संबंध मनुष्य के अचेतन मन से होता है।


3- मणिपूर चक्र :

इसका स्थान रीढ़ की हड्डी में नाभि के ठीक पीछे होता है। हमारे शरीर की पूरी पाचन क्रिया (जठराग्नि) इसी चक्र द्वारा नियंत्रित होती है। शरीर की अधिकांश आतंरिक गतिविधियां भी इसी चक्र द्वारा नियंत्रित होती है।


4- अनाहत चक्र :

यह चक्र रीढ़ की हड्डी में हृदय के दांयी ओर, सीने के बीच वाले हिस्से के ठीक पीछे मौजूद होता है।  हमारे हृदय और फेफड़ों में रक्त का प्रवाह और उनकी सुरक्षा इसी चक्र द्वारा की जाती है। शरीर का पूरा नर्वस सिस्टम भी इसी अनाहत चक्र द्वारा ही नियत्रित होता है।


5- विशुद्धि चक्र :

गले के गड्ढ़े के ठीक पीछे थायरॉयड व पैराथायरॉयड के पीछे रीढ की हड्डी में स्थित है। विशुद्धि चक्र शारीरिक वृद्धि, भूख-प्यास व ताप आदि को नियंत्रित करता है।


6- आज्ञा चक्र :

इसका सम्बन्ध दोनों भौहों के बीच वाले हिस्से के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी के ऊपर स्थित पीनियल ग्रन्थि से है। यह चक्र हमारी इच्छाशक्ति व प्रवृत्ति को नियंत्रित करता है। हम जो कुछ भी जानते या सीखते हैं उस संपूर्ण ज्ञान का केंद्र यह आज्ञा चक्र ही है।


7- मनश्चक्र- मनश्चक्र (बिन्दु या ललना चक्र) :

यह चक्र हाइपोथेलेमस में स्थित है। इसका कार्य हृदय से सम्बन्ध स्थापित करके मन व भावनाओं के अनुरूप विचारों, संस्कारों व मस्तिष्क में होने वाले स्रावों का आदि का निर्माण करना है, इसे हम मन या भावनाओं का स्थान भी कह सकते हैं।


8 – सहस्रार चक्र :

यह चक्र सभी तरह की आध्यात्मिक शक्तियों का केंद्र है। इसका सम्बन्ध मस्तिष्क व ज्ञान से है। यह चक्र पीयूष ग्रन्थि (पिट्युटरी ग्लैण्ड) से सम्बन्धित है।


इन आठ चक्र (शक्तिकेन्द्रों) में स्थित शक्ति ही सम्पूर्ण शरीर को ऊर्जान्वित (एनर्जाइज), संतुलित (Balance) व क्रियाशील (Activate) करती है। इन्हीं से शारीरिक, मानसिक विकारों व रोगों को दूर कर अन्तःचेतना को जागृत करने के उपायों को ही योग कहा गया है।


अष्टचक्र व उनसे संबंधित स्थान एवं कार्य


क्र. सं.


संस्कृत नाम


अंग्रेजी नाम


शरीर में स्थान


संबंधित अवयव व क्रियाएं


चक्र की शक्ति निष्क्रिय रहने से उत्पन्न होने वाले रोग


अन्तःस्रावी ग्रन्थियों पर क्रियाएं


क्रिया शरीरगत तंत्र


1-मूलाधार चक्र


Root cakra or pelvic plexus or coccyx center


रीढ़ की हड्डी


उत्सर्जन तत्र, प्रजनन तत्र, गुद, मूत्राशय


मूत्र विकार, वृक्क रोग, अश्मरी व रतिज रोग


अधिवृक्क ग्रन्थि


उत्सर्जन तंत्र  मूत्र व प्रजनन तत्र


2-स्वाधिष्ठान चक्र


Sacral or sexual center


नाभि के नीचे


प्रजनन तत्र


बन्ध्यत्व, ऊतक विकार, जननांग रोग


अधिवृक्क ग्रन्थि


प्रजनन तंत्र


3-मणिपूर चक्र


Solar plexus or lumbar center or epigastric Sciar plexus


छाती के नीचे


आमाशय, आत्र, पाचन तंत्र, संग्रह व स्रावण


पाचन रोग, मधुमेह, रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी


लैगरहेन्स की द्वीपिकायें (अग्न्याशयिक ग्रन्थि)


पाचन तंत्र


4-अनाहत चक्र


Heart chakra or cardiac plexus or dorsal center


छाती या सीने का का बीच वाला हिस्सा (वक्षीय कशेरुका)


हृदय, फेफड़े , मध्यस्तनिका, रक्त परिसंचरण, प्रतिरक्षण तत्र, नाड़ी तत्र


हृदय रोग, रक्तभाराधिक्य (रक्तचाप)


थायमस ग्रन्थि (बाल्य ग्रन्थि)


रक्त परिसंचरण तत्र, श्वसन तंत्र , स्वतः प्रतिरक्षण तंत्र


5-विशुद्धि चक्र


Carotid plexus or throat or cervical center


थायराइड और पैराथायरइड ग्रन्थि


ग्रीवा, कण्ठ, स्वररज्जु, स्वरयत्र, 

चयापचय, तापनियत्रण


श्वास, फेफड़ों से जुड़े रोग, अवटु ग्रन्थि, घेंघा


अवटु ग्रन्थि


श्वसन तंत्र


6-आज्ञा चक्र


Third eye or medullary plexus


अग्रमस्तिष्क का केन्द्र


मस्तिष्क तथा उसके समस्त कार्य, एकाग्रता, इच्छा शक्ति


अपस्मार, 

मूर्च्छा, पक्षाघात आदि अवसाद


पीनियल ग्रन्थि


तत्रिका तंत्र


7-मनश्चक्र या

बिन्दुचक्र


Lower mind plexus or hypothalamus


(चेतक) 

थेलेमस के नीचे


मस्तिष्क, हृदय, समस्त अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का नियत्रण, निद्रा आवेग, मेधा, स्वसंचालित तत्रिका तत्र समस्थिति


मनःकायिक तथा तत्रिका तत्र


पीयूष ग्रन्थि


संवेदी तथा प्रेरक तंत्र


8-सहस्रार चक्र


Crown chakra or cerebral gland


कपाल के नीचे


आत्मा, समस्त सूचनाओं का निर्माण, अन्य स्थानों का एकत्रीकरण


हार्मोन्स का असंतुलन, चयापचयी विकार आदि


पीयूष ग्रन्थि


केन्द्रीय तत्रिका तंत्र (अधश्चेतक के 

द्वारा)


योग और अष्टचक्र का संबंध :

अष्ट चक्रों को जानने व उनके अन्दर स्थित शक्तियों को जागृत व उर्ध्वारोहण के लिए क्या योग है? इसको समझना बहुत आवश्यक है। हर एक योग किसी ना किसी चक्र को जागृत करता है.

Friday, December 18, 2020

Paramchaitanya - From beginning to end - Hindi Article

 परम चैतन्य की सहाय्यता से सब कार्य होते हैं। 


चैतन्य के प्रकाश से ही सृष्टि का निर्माण हुआ । 

चैतन्य ही सारे सृष्टि में कण कण में विराजता है।

 चैतन्य का प्रकाश मतलब आत्मा का प्रकाश उस से हम जान सकते है सत्य और असत्य क्या है। 

चैतन्य के प्रकाश से मिथ्या अपने आप नष्ट होता है। 

चैतन्य की भाषा प्रेम की और परमात्मा की भाषा होती है।

 जो लोग बुरे कार्य करते है उन्हें चैतन्य दण्डित करता है। 

बुराई का नाश परमचैतन्य करता है और सत्य को विजय दिलाता है। 

जो लोग चैतन्य के प्रकाश के आशीर्वाद में होते हैं उनके साथ स्वयं श्री गणेश और श्री हनुमान रहते हैं। 

सारे देवीदेवता उनकी पवित्रता की, उनकी रक्षा करते हैं।



 चैतन्य सहजयोगी को बताता है कि किस मार्ग पर चलना है।

 किस प्रकार कार्य करने से सहजयोगी की विजय हो सकती है उनका भला हो सकता है।

 सहजयोगी को जिद्द कभी नही करनी चाहिए । जो मार्ग परमचैतन्य बताता है उस मार्ग पर हमेशा चलना चाहिये। 

चैतन्य स्वयं अपने आप कार्य करता है सिर्फ आपका चित्त शुद्ध होना चाहिए। आपकी इच्छा शुद्ध होनी चाहिये।

किसी चीज से डरने की सहजयोगी को आवश्यकता नहीं। 

चैतन्य मतलब शक्ति का प्रकाश मतलब माँ दुर्गा स्वयं सहजयोगी के साथ रहती हैं। 

अत्यंत आनंदमय स्थिति में रहना चाहिए। 

परेशान होनेकी जरुरत नहीं। 

परम चैतन्य के शक्ति का महत्व सहजयोगी को जानना चाहिए। अगर सहजयोगी बुराई की रास्ते पर जाये तो वही चैतन्य उस सहजयोगी को दण्डित भी कर सकता है। 

हर कार्य अत्यंत आत्म विश्वास के साथ सहजयोगी को करना चाहिए। 

सहजयोगी का मतलब होता है "शक्ति के पुजारी"।

 आप हर कार्य से शक्ति को प्रसन्न करें। 

सारे ही देवी देवता आपके साथ खड़े होंगे। सारे सृष्टि में परम चैतन्य की (पावनता की) शक्ति को फैलाने का का कार्य सहजयोगी को करना है।

सब कुछ बदल डालो और एक नया व्यक्ति बनो। फूल की तरह आप फूलते हैं, फिर वृक्ष बनता है और फिर आप स्थान ग्रहण करते हैं। 

सहजयोगी बनकर स्थान ग्रहण करें। ये आसान है। मुझे प्रसन्न करना होगा। 

क्योंकि मैं ही चित हूँ। मैं प्रसन्न हो गयी तब आपका काम होगा। 

पर भौतिक चीजों से या चर्चा करने से मैं प्रसन्न नहीं हो सकती। मैं प्रसन्न होती हूँ- आपकी तरक्की से। इस लिये स्वयं की तलाश करो।


परम पूज्य श्रीमाताजी श्री निर्मला देवी

21.5.1984



Friday, November 27, 2020

How can one be both thoughtless and aware at the same time?

 How can one be both thoughtless and aware at the same time?


The term ‘Nirvichaarita’ in Hindi is better understood than its English version we use often – ‘thoughtless awareness’ – sounds like an oxymoron combination.


The meaning is simple – empty you cup so that it can be filled with divine wisdom.

Our minds are restless – we have incessant thought pouring in from everywhere – from the past, present, future and even non-existent corners of the universe – a space created by our own minds! 


Once we are able to stop these frivolous thoughts based on our miniscule understanding of this world, our habits, experiences and conditionings…we can delve deeper into the bliss of divine nectar. For that we need to practice ‘nirvicharita’ or ‘thoughtless awareness’ which is brought about through authentic meditation with the grace of a true spiritual master or SadhGuru. For us Sahaja yogis, Shri Mataji Nirmala Devi is the guru who blessed us with the divine wisdom in the form of Sahaja Yoga.





Friday, November 20, 2020

Get rid of dualism - That is your goal - Sahaja Yoga Hindi Article

 द्वैतवाद से मुक्ति आपकी मंजिल है।


"लोग पूछेंगे,"सत्य क्या है?" 

प्रकाश के बिना, हम इसकी व्याख्या कैसे कर सकते हैं ? मान लो कि आपको सड़क पर या अन्य किसी जगह पर एक रस्सी पड़ी हुई मिलती है, और आप डर जाते हैं। 

जब तक आप उस पर रोशनी डाल कर यह सुनिश्चित नहीं करते कि यह तो केवल एक रस्सी है, और वह (साँप) एक भ्रम था, तब तक आप अपने आप को कैसे समझांएगे कि यह साँप नहीं है, बल्कि यह मात्र एक रस्सी पड़ी हुई है। अतः पहली चीज़ है कि आपका चित्त आलोकित होना चाहिए । और आपको अपनी अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिए, सत्य को खोजना होगा।

 और तब आप जान पाते हैं कि यह स्व, यह आत्मा, आनंद बिखेरती है - ऐसा आनंद जो सुख और दुख की द्वैतवाद से परे है। वैसा बनने के लिए आपको उससे परे जाना होगा, द्वैतवाद से परे। वही आपकी मंजिल है।"


प.पू माता जी श्री निर्मला देवी ।

21 नवंबर 1979.



Thursday, November 19, 2020

Shri Ganesh helps Mother Kundalini Shakti to rise

 श्री गणेश के बगैर कुण्डलिनी चढ़ नहीं सकती


“...यह समझ लिजिए कि परम-चैतन्य चारों ओर फैला हुआ है। लेकिन उसका असर तभी आता है जब आपके अन्दर पवित्रता होगी। अगर आप पवित्र नहीं है, आपके विचार शुद्ध नहीं हैं, या आप किसी और ही सतह पर रह रहे हैं, तो आप सहज की गहराई में नहीं उतर सकते। यह सूक्ष्मता जो आपने सहज में प्राप्त की है, इसमें सबसे बड़ा काम श्री गणेश ने किया है। तो श्री गणेश परम चैतन्य के चेतक हैं। ऐसा कहना चाहिए कि श्री गणेश से ही यह परमचैतन्य आलोकित हुआ है। और हर एक चक्र पर यह कार्य करते हैं। हर चक्र में जब तक निर्मलता, पवित्रता न आ जाए तब तक कुण्डलिनी का चढ़ना असम्भव है। और चढ़ती भी है तो वो बार-बार गिर जाती है। कुण्डलिनी और गणेश जी का सम्बन्ध माँ और बेटे का है...


श्री गणेश के बगैर तो कुंडलिनी चढ़ नहीं सकती क्योंकि कुंडलिनी गौरी हैं और उस गौरी को उत्थान करने में श्री गणेश उसके साथ हर समय उसे संरक्षित करते हैं। इतना ही नहीं हर चक्र पर जब कुंडलिनी चढ़ जाती है तो उसके मुँह को बंद करके कुंडलिनी को गिरने से रोकते हैं।”  


-श्री गणेश पूजा

5 दिसंबर 1993

दिल्ली, भारत